फ़र्दा कि नयामदस्त फ़रियाद मकुन
ज़ आइन्दः व बगुज़श्तः-ए-ख़ुद याद मकुन
हाले. ख़ुश बाश ब उम्र बरबाद मकुन
याद मत कर उस गुज़श्तः रोज़ को जो चल बसा
आने वाले कल की भी फ़रियाद न कर, होगा क्या?
बीते कल और आने वाले कल को युँही याद न कर
आज में ख़ुश रह, उम्र बरबाद कर के होगा क्या?
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