खण्ड- मानव हैं कि दानव:
9. कैसी भैरव लीला है यह विश्व का आवर्तन!
कैसे उन्मत्त बनकर भूत करते ग्राम का नर्तन!
कैसे अग्निपिण्ड हैं ये, क्या अंतर आयाम!
विस्मयकारी सृष्टि है ये कितनी भोलेराम!
10. कैसा है यह विश्व निरंतर होता क्यों आघात?
छुपा अद्भुत, अपार शक्ति का क्या इसमें हाथ?
मानव का क्या मूल्य, लक्ष्य औ' क्या है परिणाम?
इन बातों का अर्थ भला क्या समझे भोलेराम?
11. आज धरा को मिला है कैसा देवों का अभिशाप।
मृत्यु नृत्य हर कहीं कर रही अट्टहास कर आप।
प्रतिदिन हर इक स्थान से सुनते यह अविराम।
सर चकराता कहाँ है इसका अन्त हे भोलेराम?
12. मानव हैं या दानव हैं, इस तप्त धरा के लोग?
अग्नि दमन को अश्रु की जगह करें रक्त उपयोग!
क्यों निरंतर चलता द्वेष, आग धुँए का काम?
धरती है वध-स्थल, यह बतला भोलेराम?
13. परम सिद्धि स्वातंत्र्य की क्या यही पुरुष की एक?
क्या पृथ्वी का नित्य प्रति करें वो रक्त अभिषेक?
पुष्पमाला सम खड़्ग का यूँ कर प्रयोग अविराम!
सुरभि इससे फैलेगी क्या चहुंदिश भोलेराम?
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