Monday, 10 March 2025

उमर ख़य्याम की रुबाई... चूँ ज़ आबो-गिल आफ़रीद सानअ' मारा....

चूँ ज़ आबो-गिल आफ़रीद सानअ' मारा
कर्दः   ब   ग़मे-ज़मानः   कानअ'   मारा
बैवस्तः   ज़   मय  हमीं   मन  अ   कुनी 
ख़ुद  दस्त   तिही  बसस्त  मानअ'  मारा


ख़ालिक़ ने माटी पानी से गूँधा औ' जान डाली
ग़म दुनिया के सहने की क़ुव्वत भी आन डाली
मयख़ाने में आने से  क्यों मुझ को रोक  रहा है
जब करती मुझको मन'अ ख़ुद मेरी जेब ख़ाली


God has shaped me out of water' n soil.
To bear world grief, the capacity to toil.
Why do you stop my entry in the tavern
I'm barred from bar by garb sans  royal. 

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